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भारत में इंटरनेट शटडाउन: पत्रकारों के लिए जोखिम और व्यावहारिक गाइड

2012 से अब तक भारत में 900 से अधिक बार इंटरनेट बंद किया जा चुका है, जिससे यह इस तरह की पाबंदियों से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल हो गया है। ये रुकावटें प्रेस की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों के सूचना देने के अधिकार के लिए गंभीर खतरा हैं। फ्री सॉफ्टवेयर के समर्थन में काम करने वाली संस्था सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) के साथ मिलकर, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने एक वीडियो तैयार किया है, जिसमें तकनीकी पहलुओं को समझाया गया है और मीडिया पेशेवरों के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं।

वीडियो


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भारत में इंटरनेट शटडाउन का सबसे ज्यादा असर उन पत्रकारों पर पड़ता है जो दूरदराज या संवेदनशील इलाकों में काम करते हैं, जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्य या वे क्षेत्र जहां सांप्रदायिक तनाव रहता है।

जमीनी तौर पर काम करने वाले पत्रकारों के लिए इंटरनेट कोई सुविधा नहीं, बल्कि एक जरूरी साधन है, जानकारी भेजने, स्रोतों की पुष्टि करने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। जब इंटरनेट बंद कर दिया जाता है या उसकी स्पीड 2G तक सीमित कर दी जाती है, तो पत्रकार अलग-थलग पड़ जाते हैं। वे तुरंत खबरें प्रकाशित नहीं कर पाते और जोखिम भी बढ़ जाता है। वहीं, स्वतंत्र न्यूज़रूम के लिए काम जारी रखना मुश्किल हो जाता है।

अक्सर अधिकारी इंटरनेट बंद करने को कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हैं, लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि इससे हिंसा रुकती नहीं है, बल्कि कई बार सामाजिक तनाव और बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जिसने पिछले दो वर्षों में 54 देशों में सरकार द्वारा लगाए गए 300 से अधिक इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए हैं, ऐसे कदम सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और नागरिकों के सूचना पाने के मूल अधिकार के लिए खतरा हैं।

कुछ भारतीय राज्यों में स्थानीय इंटरनेट शटडाउन

इंटरनेट शटडाउन का सबसे ज्यादा असर उन इलाकों में काम कर रहे पत्रकारों पर पड़ता है, जो दूरदराज या संघर्ष प्रभावित हैं—जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्य और वे क्षेत्र जहां सांप्रदायिक तनाव बना रहता है। मैदान में काम करने वाले पत्रकारों के लिए इंटरनेट एक जरूरी साधन है, जिससे वे तुरंत जानकारी भेजते हैं, अपने स्रोतों की पुष्टि करते हैं और अपनी सुरक्षा बनाए रखते हैं।

जब इंटरनेट पूरी तरह बंद कर दिया जाता है या उसकी स्पीड 2G तक सीमित कर दी जाती है, तो पत्रकार अलग-थलग पड़ जाते हैं। वे खबरें प्रकाशित नहीं कर पाते और उनके सामने जोखिम बढ़ जाता है। वहीं, स्वतंत्र न्यूज़रूम के लिए काम जारी रखना मुश्किल हो जाता है, जिससे आम लोगों तक पहुंचने वाली जानकारी भी प्रभावित होती है। 

भारत में कानूनी उपाय और प्रेस की आजादी की सुरक्षा

भारत में मनमाने तरीके से लगाए गए इंटरनेट शटडाउन को चुनौती देने के लिए कई कानूनी रास्ते मौजूद हैं:

  •       संवैधानिक उपाय: पत्रकार और मीडिया संस्थान हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर सकते हैं, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) के उल्लंघन का हवाला दिया जाता है।
  •       महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला: अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट शटडाउन कानूनी, आवश्यक, संतुलित और अस्थायी होना चाहिए, और इससे जुड़े आदेश सार्वजनिक किए जाने जरूरी हैं।
  •     पारदर्शिता की मांग: पत्रकार यह मांग कर सकते हैं कि शटडाउन से जुड़े आदेश सार्वजनिक किए जाएं और यह भी बताया जाए कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं।
  •     प्रशासनिक समीक्षा: लंबे समय तक चले शटडाउन या बिना ठोस कारण के लिए लिए गए फैसलों की समीक्षा संबंधित समितियों द्वारा की जा सकती है।
  •     प्रभाव का दस्तावेजीकरण: मीडिया संस्थान इन शटडाउन के वास्तविक असर—जैसे काम में रुकावट, आर्थिक नुकसान, पत्रकारों के बढ़ते जोखिम और गलत सूचनाओं के फैलाव—को दर्ज कर सकते हैं।
  •     रणनीतिक कानूनी पहल: SFLC.in जैसी संस्थाएं कानूनी लड़ाई में मदद करती हैं, समर्थन देती हैं और ऐसे फैसलों के खिलाफ उदाहरण (प्रेसिडेंट) स्थापित करती हैं, जो प्रेस की आजादी के पक्ष में हों।
  •       रोकथाम का असर: लगातार कानूनी कोशिशें प्रशासन के फैसलों पर निगरानी रखने और मनमाने शटडाउन को सीमित करने में मदद करती हैं।

तकनीकी तैयारी और कानूनी सतर्कता—इन दोनों को साथ लेकर चलने से पत्रकार लंबे समय तक चलने वाले इंटरनेट शटडाउन के दौरान भी लोगों तक जानकारी पहुंचा सकते हैं, अपनी सुरक्षा बनाए रख सकते हैं और सूचना के अधिकार की रक्षा कर सकते हैं।

 

आगे पढ़ने के लिए

लेख देखें: “इंटरनेट शटडाउन – एक पत्रकार के रूप में इसे समझना और प्रतिक्रिया देना।”
“Internet Shutdowns: Understanding and responding as a journalist.”